
सिद्धार्थनगर नेपाल सीमा से सटे तराई क्षेत्र में बसी यह जमीन हर साल बाढ़ और कटान की मार झेलने को मानो अभिशप्त हो चुकी है, जहां राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बनगंगा, कूड़ा और जमुआर नाला जैसी नदियां बरसात के मौसम में विकराल रूप धारण कर पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लेती हैं।

नेपाल से अचानक छोड़ा गया पानी जब इन नदियों में एक साथ उतरता है, तो हालात नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं और कछार क्षेत्र के गांव जलमग्न होकर टापू में तब्दील हो जाते हैं। सबसे अधिक असर उन किसानों पर पड़ता है, जिनकी पूरी आजीविका खेती पर निर्भर है—उनकी फसलें बह जाती हैं, उपजाऊ जमीन नदी के कटान में समा जाती है और जीवन यापन का हर साधन खत्म होने लगता है। लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक पहलू यह है कि इस स्थायी समस्या के बावजूद समाधान की दिशा में हर साल केवल अस्थायी और खानापूर्ति वाली तैयारी ही देखने को मिलती है। शासन द्वारा बांधों की मरम्मत और कटान रोकने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित किए जाते हैं, सिंचाई विभाग, पीडब्ल्यूडी और अन्य संबंधित एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य की गुणवत्ता और समयबद्धता दोनों सवालों के घेरे में रहती हैं। ग्रामीणों के अनुसार, बांधों की मरम्मत समय से पहले—मई के महीने में—पूरी हो जानी चाहिए, लेकिन अक्सर काम अधूरा छोड़ दिया जाता है या केवल कागजों में पूरा दिखा दिया जाता है। कई स्थानों पर चूहों, सुअरों और अन्य जानवरों द्वारा बांधों में सुरंग बना दी जाती है, जिन्हें बंद करने की कोई गंभीर व्यवस्था नहीं होती। यही कमजोरियां मानसून के दौरान बड़े खतरे में बदल जाती हैं, जब तेज बहाव के दबाव में बांध धीरे-धीरे रिसने लगते हैं और फिर अचानक टूटने की नौबत आ जाती है। इसके बाद जो तबाही होती है, वह किसी आपदा से कम नहीं होती—गांव के सामने कटान शुरू हो जाता है, लोग रातों-रात अपने घर छोड़कर बांधों पर शरण लेने को मजबूर हो जाते हैं, जहां न भोजन की समुचित व्यवस्था होती है, न पीने के पानी की और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं। स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कट जाता है, जिससे राहत और बचाव कार्य भी प्रभावित होते हैं। प्रशासन की ओर से कलेक्ट्रेट या विकास भवन स्तर पर 24 घंटे सेवा या कंट्रोल रूम की व्यवस्था की जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर उसकी पहुंच सीमित ही रह जाती है। बाढ़ के दौरान गरीब परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट अपने परिवार और मवेशियों को सुरक्षित रखने का होता है लोग गाय, भैंस, बकरी और छोटे बच्चों को लेकर ऊंचे स्थानों पर भागते हैं और कई दिनों तक असुरक्षा और भय के बीच जीवन बिताते हैं। इसके साथ ही बाढ़ के बाद महामारी और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे हालात और भयावह हो जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ठेकेदारों द्वारा केवल औपचारिकता निभाई जाती है—कुछ जगह ट्रैक्टर और जेसीबी लगाकर फोटो खिंचवा दी जाती है और भुगतान निकाल लिया जाता है, जबकि वास्तविक जरूरत वाले स्थानों पर मजबूत ठोकर, पिचिंग और बांध सुदृढ़ीकरण का कार्य नहीं किया जाता। यह भी देखा गया है कि जिन स्थानों पर हर साल कटान होता है, वहां स्थायी समाधान के बजाय बार-बार अस्थायी उपाय किए जाते हैं, जिससे समस्या जस की तस बनी रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक तरीके से बांधों की जांच, कमजोर स्थानों की पहचान, जानवरों द्वारा किए गए नुकसान की मरम्मत और कटान प्रभावित क्षेत्रों में मजबूत संरचनात्मक कार्य किए जाएं, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही स्थानीय किसानों और नदी किनारे रहने वाले लोगों से उनकी वास्तविक समस्याओं को समझकर योजनाएं बनाई जाएं, तो समाधान अधिक प्रभावी हो सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार भी मानसून आने के बाद प्रशासन सक्रिय होगा या पहले से ही ठोस और ईमानदार तैयारी की जाएगी। जब तक जिम्मेदार विभाग अपनी जवाबदेही को गंभीरता से नहीं निभाते और कार्यों की निगरानी सख्ती से नहीं होती, तब तक सिद्धार्थनगर के किसानों और ग्रामीणों के लिए बाढ़ और कटान हर साल एक नई त्रासदी बनकर आती रहेगी—जहां उनकी जिंदगी, मेहनत और भविष्य हर बार पानी के साथ बहता रहेगा।












